मैं यहाँ भारत में पिछले 70–80 वर्षों से चली आ रही और विशेष रूप से पिछले 26 वर्षों में सक्रिय रही विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संस्थाओं, समूहों, संगठनों, मंदिरों, मठों और बाबाओं की कार्यशैली, आचरण, चरित्र, विकृतियों, दिखावे, पाखंड, अधर्म तथा स्वयं के विस्तार, संचालन, प्रचार-प्रसार और प्रभाव बढ़ाने के तौर-तरीकों के बारे में लिख रहा हूँ।
यहाँ मैं इन संस्थाओं और संगठनों के काम करने के तरीके, उनके व्यवहार, उनकी गतिविधियों तथा समाज और धर्म के नाम पर अपनाए जाने वाले विभिन्न तौर-तरीकों का विश्लेषण प्रस्तुत कर रहा हूँ।
इस विषय पर मैंने अत्यंत गहन अध्ययन और शोध किया है। अनेक लोगों के साथ विस्तृत चर्चा करने के बाद मैं कुछ निष्कर्षों तक पहुँचा हूँ। इसके अतिरिक्त, जमीनी स्तर पर प्रत्यक्ष रूप से कार्य करने वाले कई विश्वसनीय व्यक्तियों से प्राप्त जानकारियों को भी अपने अध्ययन में शामिल किया है।
मेरे अनुसार, ये जानकारियाँ प्रत्यक्ष घटनाओं, नियमित गतिविधियों और वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित हैं। इन्हें दैनिक और साप्ताहिक स्तर पर एकत्रित किया गया है। मैं इन जानकारियों को विश्वसनीय और प्रमाणित मानता हूँ।
इस पूरे अध्ययन में मेरे व्यक्तिगत शोध, विश्लेषणात्मक सोच, तर्कशक्ति, विभिन्न पुस्तकों के अध्ययन, सूचनाओं के संग्रह, इंटेलिजेंस गैदरिंग (Intelligence Gathering) और निरंतर निगरानी (Monitoring) को शामिल किया गया है।
1. सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संगठनों में नकारात्मकता और पाखंड
मैं यहाँ मुख्य रूप से उन गतिविधियों और व्यक्तियों के बारे में बात कर रहा हूँ, जो मेरे अध्ययन के अनुसार इन सभी श्रेणियों में नकारात्मक भूमिका निभा रहे हैं।
मेरे आकलन में लगभग 99% गतिविधियाँ और उनके परिणाम नकारात्मक दिखाई देते हैं। इसलिए मेरा ध्यान मुख्य रूप से इन्हीं नकारात्मक प्रवृत्तियों, व्यक्तियों और संगठनों पर केंद्रित है।
क्योंकि जब तक हम इन नकारात्मक गतिविधियों की पहचान नहीं करेंगे, इनके वास्तविक स्वरूप को समाज के सामने नहीं लाएँगे और लोगों को इनके बारे में जागरूक नहीं करेंगे, तब तक इन्हें रोकना या इनमें सकारात्मक परिवर्तन लाना संभव नहीं होगा।
हालाँकि, मेरे अनुसार लगभग 1% ऐसे धार्मिक समूह और व्यक्ति भी हैं, जो वास्तविक इतिहास, धर्म और संगठन के क्षेत्र में सही दिशा में कार्य कर रहे हैं।
उदाहरण के लिए, यति नरसिंहानंद गिरि जी महाराज, शिवशक्ति धाम डासना और उनके शिष्यों द्वारा इतिहास, धर्म तथा धार्मिक संगठन से संबंधित कुछ कार्य किए जा रहे हैं, जिन्हें मैं सही दिशा में किए जा रहे प्रयास मानता हूँ।
लेकिन दुर्भाग्य से इन कार्यों के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है।
दूसरी ओर, मेरे अवलोकन के अनुसार, समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग आज धर्म को केवल अपनी व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं, मनोरंजन, नाच-गाने, पार्टियों, अंधश्रद्धा, पाखंड, दिखावे तथा दान-दक्षिणा लेने और देने तक सीमित करके बैठा है।
धर्म के वास्तविक उद्देश्य, इतिहास, सिद्धांतों, सामाजिक उत्तरदायित्व और संगठनात्मक शक्ति की ओर बहुत कम लोगों का ध्यान जाता है।
2. मंदिरों की संपत्ति, राजनीतिक नियंत्रण और धन का दुरुपयोग
यहाँ मैं भारत के उन अनेक मंदिरों की बात कर रहा हूँ, जहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं और जहाँ दान के रूप में भारी मात्रा में धन एकत्रित होता है।
मेरे अध्ययन और आकलन के अनुसार, ऐसे अनेक बड़े और आर्थिक रूप से संपन्न मंदिरों पर राजनीतिक प्रभाव रखने वाले व्यक्तियों, समूहों और अन्य स्वार्थी तत्वों का नियंत्रण है।
मेरा आरोप है कि इन मंदिरों में एकत्रित होने वाले धन का बड़ा हिस्सा प्रत्यक्ष रूप से समाज और धर्म के हित में उपयोग नहीं किया जा रहा है।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि मेरे अनुमान के अनुसार, मंदिरों में एकत्रित होने वाले कुल धन का संभवतः केवल 5% हिस्सा ही हिंदू समाज के वास्तविक हित में खर्च किया जाता होगा।
वह भी कई मामलों में केवल इसलिए किया जाता है, ताकि समाज के सामने यह दिखाया जा सके कि धर्म और समाज के लिए कुछ कार्य किए जा रहे हैं।
मेरे आकलन में शेष धन का बड़ा हिस्सा राजनीतिक गतिविधियों, प्रभावशाली व्यक्तियों के निजी हितों, कुछ बाबाओं की सुख-सुविधाओं तथा संबंधित समूहों के स्वार्थों को पूरा करने में उपयोग किया जा रहा है।
इसके अतिरिक्त, मेरे पास प्राप्त कुछ जानकारियों के आधार पर यह भी आरोप है कि मंदिरों के धन का उपयोग राजनीतिक समूहों तथा मुस्लिम समुदाय से संबंधित मदरसों और मस्जिदों के निर्माण जैसे कार्यों में भी किया जा रहा है।
इन आरोपों की वास्तविकता और धन के उपयोग की पूरी जानकारी सामने लाने के लिए स्वतंत्र जाँच, वित्तीय पारदर्शिता और प्रमाणों की आवश्यकता है।
भारत में भूमि पर अवैध कब्जों का विषय भी अत्यंत गंभीर है।
मेरा आरोप है कि कुछ स्थानों पर मस्जिदों, मदरसों और कब्रिस्तानों के नाम पर जमीनों पर अवैध कब्जे किए जा रहे हैं।
इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि मेरे अनुसार, कुछ बाबा, राजनीतिक व्यक्ति और विभिन्न संगठनों के नेता ऐसे मामलों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करते हैं।
इस प्रकार की गतिविधियों में शामिल व्यक्तियों और उनके राजनीतिक तथा संगठनात्मक संबंधों की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।
3. कत्लखानों, हत्या, वेश्यावृत्ति, भ्रष्टाचार और ब्लैकमेलिंग का नेटवर्क
मेरे अध्ययन में एक और अत्यंत गंभीर विषय सामने आया है।
यह विषय कत्लखानों के संचालन से लेकर हत्या, वेश्यावृत्ति के अड्डों, भ्रष्टाचार और विभिन्न प्रकार की आपराधिक गतिविधियों से संबंधित है।
मेरा आरोप है कि इन गतिविधियों में कुछ नौकरशाह, सामान्य पुलिस अधिकारी, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, बाबा, धार्मिक संगठनों के नेता, सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी और राजनीतिक नेता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं।
मेरे अनुसार, इनमें से कुछ प्रभावशाली व्यक्ति वेश्यावृत्ति से जुड़े मामलों, यौन शोषण और अन्य आपत्तिजनक गतिविधियों में फँसे हुए हैं।
ऐसी गतिविधियों के कारण वे एक-दूसरे के विरुद्ध ब्लैकमेलिंग का सहारा लेते हैं या स्वयं ब्लैकमेलिंग का शिकार बनते हैं।
मेरा यह भी आरोप है कि कुछ मामलों में ऐसे व्यक्तियों को आतंकवादी नेटवर्क, विदेशी प्रभाव वाले समूहों तथा भारत, पश्चिमी देशों और मध्य पूर्व में सक्रिय कुछ कट्टरपंथी या आपराधिक तत्वों द्वारा ब्लैकमेल किया जाता है।
इनमें कुछ ऐसे समूहों की संलिप्तता की भी आशंका है, जो धार्मिक पहचान का उपयोग अपने राजनीतिक, आर्थिक या आपराधिक उद्देश्यों के लिए करते हैं।
मेरे अनुसार, यह केवल व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का विषय नहीं है, बल्कि विभिन्न प्रभावशाली व्यक्तियों, धार्मिक संस्थाओं, सामाजिक संगठनों, प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक समूहों के बीच संभावित आपराधिक गठजोड़ का अत्यंत गंभीर मामला है।
इस पूरे नेटवर्क की वास्तविकता, इसमें शामिल व्यक्तियों की भूमिका, उनके आपसी संबंधों और संभावित विदेशी प्रभाव की निष्पक्ष तथा प्रमाण-आधारित जाँच आवश्यक है।
मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ। जैसे कि गोविंद गिरि जी नाम के एक व्यक्ति हैं, जो राम मंदिर की समिति से सीधे जुड़े हुए हैं या फिर उस समिति में किसी पद पर हैं। उनका वहाँ काफी नियंत्रण है। जो भी हो, लेकिन ये स्वयं को हिंदू कहते हैं और अपने नाम तथा वेशभूषा से भी स्वयं को हिंदू के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
अब इनका कहना है कि मुसलमानों ने इन्हें एक बंद कमरे में राम मंदिर के लिए 50 हजार रुपये का दान दिया था। इसलिए राम मंदिर में दिया गया दान सभी का है और इसमें मुसलमानों का भी सहयोग है।
अब मेरे विचार से यह व्यक्ति या तो 100% मनोरोगी है, या इस्लाम कबूल कर चुका है और बहरूपिया बनकर हिंदू समाज के बीच रह रहा है।
अब इस्लाम कैसे काम करता है, वह मैं आपको समझाता हूँ।
मेरे विचार से इस्लाम एक संगठित आपराधिक गिरोह की तरह काम करता है। इसे एक ऐसी राजनीतिक, आपराधिक और धार्मिक व्यवस्था के रूप में समझिए, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। इसमें धार्मिक पौराणिक कथाओं, राजनीतिक विचारों और आपराधिक मानसिकता को मिलाकर एक मनोवैज्ञानिक व्यवस्था तैयार की गई है।
मेरे अनुसार, यह एक ऐसी मानसिक व्यवस्था है, जिसमें यदि जन्म से ही किसी व्यक्ति को एक जैसा वातावरण, शिक्षा, आचार-विचार और मानसिक प्रशिक्षण लगातार तथा मजबूती से दिया जाए, तो वही मानसिकता अगली पीढ़ी में भी 100% दोहराई जा सकती है।
अब इनका काम करने का तरीका यह है कि किसी भी समाज में कोई विचार कैसे स्थापित करना है, इसके लिए ये पहले उस समाज का विशेष रूप से अध्ययन करते हैं और फिर धीरे-धीरे उस विचार को समाज में स्थापित करते हैं।
उदाहरण के लिए, मेरा संदेह है कि गोविंद गिरि जी से यह बात ब्लैकमेल करके या किसी अन्य कारण से बुलवाई गई होगी।
अब मान लीजिए कि अगले पाँच वर्षों में राम मंदिर के धन से कोई अस्पताल बनवाया जाता है। यह केवल एक उदाहरण है।
तो उस अस्पताल के निर्माण के लिए किसी मुस्लिम बहुल क्षेत्र का चयन किया जाएगा। इसके बाद हिंदुओं के दान से एकत्रित धन से उस अस्पताल में मुसलमानों का इलाज किया जाएगा।
और उस समय यह तर्क दिया जाएगा कि मुसलमानों ने भी राम मंदिर के निर्माण के लिए दान दिया था, इसलिए इस धन पर उनका भी अधिकार है।
मेरे अनुसार, इस प्रकार की पूरी प्रक्रिया को इस्लाम से जुड़े प्रभावशाली तत्व बाहर रहकर भी राजनीति और गोविंद गिरि जैसे व्यक्तियों के माध्यम से संचालित करवा सकते हैं।
यही बात वैष्णो देवी मंदिर के मामले में भी हुई।
वहाँ एक मेडिकल कॉलेज खोला गया और मेरी जानकारी के अनुसार, उसकी लगभग 80% सीटें कश्मीर के मुसलमानों को दे दी गईं।
लेकिन जब लोगों ने इसका विरोध किया और यह मामला सार्वजनिक रूप से उजागर हुआ, तब इसे रोक दिया गया।
अब प्रश्न यह है कि आखिर यह सब हुआ कैसे?
मेरे विचार से वैष्णो देवी मंदिर का संचालन करने वाले और मंदिर के धन के उपयोग का निर्णय लेने वाले व्यक्तियों में से कोई न कोई इस्लाम से जुड़े प्रभावशाली तत्वों के दबाव या प्रभाव में रहा होगा। मुझे इस बात का 100% संदेह है।
मेरे अनुसार, यही स्थिति भारत के लगभग हर गाँव, हर संगठन और हर मंदिर में दिखाई देती है।
मेरा आकलन है कि लगभग 90% स्थानों पर इसी प्रकार की कार्यप्रणाली अपनाई जा रही है।





