मैं यहाँ भारत में पिछले 70–80 वर्षों से चली आ रही और विशेष रूप से पिछले 26 वर्षों में सक्रिय रही विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संस्थाओं, समूहों, संगठनों, मंदिरों, मठों और बाबाओं की कार्यशैली, आचरण, चरित्र, विकृतियों, दिखावे, पाखंड, अधर्म तथा स्वयं के विस्तार, संचालन, प्रचार-प्रसार और प्रभाव बढ़ाने के तौर-तरीकों के बारे में लिख रहा हूँ।
यहाँ मैं इन संस्थाओं और संगठनों के काम करने के तरीके, उनके व्यवहार, उनकी गतिविधियों तथा समाज और धर्म के नाम पर अपनाए जाने वाले विभिन्न तौर-तरीकों का विश्लेषण प्रस्तुत कर रहा हूँ।
इस विषय पर मैंने अत्यंत गहन अध्ययन और शोध किया है। अनेक लोगों के साथ विस्तृत चर्चा करने के बाद मैं कुछ निष्कर्षों तक पहुँचा हूँ। इसके अतिरिक्त, जमीनी स्तर पर प्रत्यक्ष रूप से कार्य करने वाले कई विश्वसनीय व्यक्तियों से प्राप्त जानकारियों को भी अपने अध्ययन में शामिल किया है।
मेरे अनुसार, ये जानकारियाँ प्रत्यक्ष घटनाओं, नियमित गतिविधियों और वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित हैं। इन्हें दैनिक और साप्ताहिक स्तर पर एकत्रित किया गया है। मैं इन जानकारियों को विश्वसनीय और प्रमाणित मानता हूँ।
इस पूरे अध्ययन में मेरे व्यक्तिगत शोध, विश्लेषणात्मक सोच, तर्कशक्ति, विभिन्न पुस्तकों के अध्ययन, सूचनाओं के संग्रह, इंटेलिजेंस गैदरिंग (Intelligence Gathering) और निरंतर निगरानी (Monitoring) को शामिल किया गया है।
1. सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संगठनों में नकारात्मकता और पाखंड
मैं यहाँ मुख्य रूप से उन गतिविधियों और व्यक्तियों के बारे में बात कर रहा हूँ, जो मेरे अध्ययन के अनुसार इन सभी श्रेणियों में नकारात्मक भूमिका निभा रहे हैं।
मेरे आकलन में लगभग 99% गतिविधियाँ और उनके परिणाम नकारात्मक दिखाई देते हैं। इसलिए मेरा ध्यान मुख्य रूप से इन्हीं नकारात्मक प्रवृत्तियों, व्यक्तियों और संगठनों पर केंद्रित है।
क्योंकि जब तक हम इन नकारात्मक गतिविधियों की पहचान नहीं करेंगे, इनके वास्तविक स्वरूप को समाज के सामने नहीं लाएँगे और लोगों को इनके बारे में जागरूक नहीं करेंगे, तब तक इन्हें रोकना या इनमें सकारात्मक परिवर्तन लाना संभव नहीं होगा।
हालाँकि, मेरे अनुसार लगभग 1% ऐसे धार्मिक समूह और व्यक्ति भी हैं, जो वास्तविक इतिहास, धर्म और संगठन के क्षेत्र में सही दिशा में कार्य कर रहे हैं।
उदाहरण के लिए, यति नरसिंहानंद गिरि जी महाराज, शिवशक्ति धाम डासना और उनके शिष्यों द्वारा इतिहास, धर्म तथा धार्मिक संगठन से संबंधित कुछ कार्य किए जा रहे हैं, जिन्हें मैं सही दिशा में किए जा रहे प्रयास मानता हूँ।
लेकिन दुर्भाग्य से इन कार्यों के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है।
दूसरी ओर, मेरे अवलोकन के अनुसार, समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग आज धर्म को केवल अपनी व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं, मनोरंजन, नाच-गाने, पार्टियों, अंधश्रद्धा, पाखंड, दिखावे तथा दान-दक्षिणा लेने और देने तक सीमित करके बैठा है।
धर्म के वास्तविक उद्देश्य, इतिहास, सिद्धांतों, सामाजिक उत्तरदायित्व और संगठनात्मक शक्ति की ओर बहुत कम लोगों का ध्यान जाता है।
2. मंदिरों की संपत्ति, राजनीतिक नियंत्रण और धन का दुरुपयोग
यहाँ मैं भारत के उन अनेक मंदिरों की बात कर रहा हूँ, जहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं और जहाँ दान के रूप में भारी मात्रा में धन एकत्रित होता है।
मेरे अध्ययन और आकलन के अनुसार, ऐसे अनेक बड़े और आर्थिक रूप से संपन्न मंदिरों पर राजनीतिक प्रभाव रखने वाले व्यक्तियों, समूहों और अन्य स्वार्थी तत्वों का नियंत्रण है।
मेरा आरोप है कि इन मंदिरों में एकत्रित होने वाले धन का बड़ा हिस्सा प्रत्यक्ष रूप से समाज और धर्म के हित में उपयोग नहीं किया जा रहा है।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि मेरे अनुमान के अनुसार, मंदिरों में एकत्रित होने वाले कुल धन का संभवतः केवल 5% हिस्सा ही हिंदू समाज के वास्तविक हित में खर्च किया जाता होगा।
वह भी कई मामलों में केवल इसलिए किया जाता है, ताकि समाज के सामने यह दिखाया जा सके कि धर्म और समाज के लिए कुछ कार्य किए जा रहे हैं।
मेरे आकलन में शेष धन का बड़ा हिस्सा राजनीतिक गतिविधियों, प्रभावशाली व्यक्तियों के निजी हितों, कुछ बाबाओं की सुख-सुविधाओं तथा संबंधित समूहों के स्वार्थों को पूरा करने में उपयोग किया जा रहा है।
इसके अतिरिक्त, मेरे पास प्राप्त कुछ जानकारियों के आधार पर यह भी आरोप है कि मंदिरों के धन का उपयोग राजनीतिक समूहों तथा मुस्लिम समुदाय से संबंधित मदरसों और मस्जिदों के निर्माण जैसे कार्यों में भी किया जा रहा है।
इन आरोपों की वास्तविकता और धन के उपयोग की पूरी जानकारी सामने लाने के लिए स्वतंत्र जाँच, वित्तीय पारदर्शिता और प्रमाणों की आवश्यकता है।
भारत में भूमि पर अवैध कब्जों का विषय भी अत्यंत गंभीर है।
मेरा आरोप है कि कुछ स्थानों पर मस्जिदों, मदरसों और कब्रिस्तानों के नाम पर जमीनों पर अवैध कब्जे किए जा रहे हैं।
इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि मेरे अनुसार, कुछ बाबा, राजनीतिक व्यक्ति और विभिन्न संगठनों के नेता ऐसे मामलों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करते हैं।
इस प्रकार की गतिविधियों में शामिल व्यक्तियों और उनके राजनीतिक तथा संगठनात्मक संबंधों की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।
3. कत्लखानों, हत्या, वेश्यावृत्ति, भ्रष्टाचार और ब्लैकमेलिंग का नेटवर्क
मेरे अध्ययन में एक और अत्यंत गंभीर विषय सामने आया है।
यह विषय कत्लखानों के संचालन से लेकर हत्या, वेश्यावृत्ति के अड्डों, भ्रष्टाचार और विभिन्न प्रकार की आपराधिक गतिविधियों से संबंधित है।
मेरा आरोप है कि इन गतिविधियों में कुछ नौकरशाह, सामान्य पुलिस अधिकारी, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, बाबा, धार्मिक संगठनों के नेता, सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी और राजनीतिक नेता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हैं।
मेरे अनुसार, इनमें से कुछ प्रभावशाली व्यक्ति वेश्यावृत्ति से जुड़े मामलों, यौन शोषण और अन्य आपत्तिजनक गतिविधियों में फँसे हुए हैं।
ऐसी गतिविधियों के कारण वे एक-दूसरे के विरुद्ध ब्लैकमेलिंग का सहारा लेते हैं या स्वयं ब्लैकमेलिंग का शिकार बनते हैं।
मेरा यह भी आरोप है कि कुछ मामलों में ऐसे व्यक्तियों को आतंकवादी नेटवर्क, विदेशी प्रभाव वाले समूहों तथा भारत, पश्चिमी देशों और मध्य पूर्व में सक्रिय कुछ कट्टरपंथी या आपराधिक तत्वों द्वारा ब्लैकमेल किया जाता है।
इनमें कुछ ऐसे समूहों की संलिप्तता की भी आशंका है, जो धार्मिक पहचान का उपयोग अपने राजनीतिक, आर्थिक या आपराधिक उद्देश्यों के लिए करते हैं।
मेरे अनुसार, यह केवल व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का विषय नहीं है, बल्कि विभिन्न प्रभावशाली व्यक्तियों, धार्मिक संस्थाओं, सामाजिक संगठनों, प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक समूहों के बीच संभावित आपराधिक गठजोड़ का अत्यंत गंभीर मामला है।
इस पूरे नेटवर्क की वास्तविकता, इसमें शामिल व्यक्तियों की भूमिका, उनके आपसी संबंधों और संभावित विदेशी प्रभाव की निष्पक्ष तथा प्रमाण-आधारित जाँच आवश्यक है।
मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ। जैसे कि गोविंद गिरि जी नाम के एक व्यक्ति हैं, जो राम मंदिर की समिति से सीधे जुड़े हुए हैं या फिर उस समिति में किसी पद पर हैं। उनका वहाँ काफी नियंत्रण है। जो भी हो, लेकिन ये स्वयं को हिंदू कहते हैं और अपने नाम तथा वेशभूषा से भी स्वयं को हिंदू के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
अब इनका कहना है कि मुसलमानों ने इन्हें एक बंद कमरे में राम मंदिर के लिए 50 हजार रुपये का दान दिया था। इसलिए राम मंदिर में दिया गया दान सभी का है और इसमें मुसलमानों का भी सहयोग है।
अब मेरे विचार से यह व्यक्ति या तो 100% मनोरोगी है, या इस्लाम कबूल कर चुका है और बहरूपिया बनकर हिंदू समाज के बीच रह रहा है।
अब इस्लाम कैसे काम करता है, वह मैं आपको समझाता हूँ।
मेरे विचार से इस्लाम एक संगठित आपराधिक गिरोह की तरह काम करता है। इसे एक ऐसी राजनीतिक, आपराधिक और धार्मिक व्यवस्था के रूप में समझिए, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। इसमें धार्मिक पौराणिक कथाओं, राजनीतिक विचारों और आपराधिक मानसिकता को मिलाकर एक मनोवैज्ञानिक व्यवस्था तैयार की गई है।
मेरे अनुसार, यह एक ऐसी मानसिक व्यवस्था है, जिसमें यदि जन्म से ही किसी व्यक्ति को एक जैसा वातावरण, शिक्षा, आचार-विचार और मानसिक प्रशिक्षण लगातार तथा मजबूती से दिया जाए, तो वही मानसिकता अगली पीढ़ी में भी 100% दोहराई जा सकती है।
अब इनका काम करने का तरीका यह है कि किसी भी समाज में कोई विचार कैसे स्थापित करना है, इसके लिए ये पहले उस समाज का विशेष रूप से अध्ययन करते हैं और फिर धीरे-धीरे उस विचार को समाज में स्थापित करते हैं।
उदाहरण के लिए, मेरा संदेह है कि गोविंद गिरि जी से यह बात ब्लैकमेल करके या किसी अन्य कारण से बुलवाई गई होगी।
अब मान लीजिए कि अगले पाँच वर्षों में राम मंदिर के धन से कोई अस्पताल बनवाया जाता है। यह केवल एक उदाहरण है।
तो उस अस्पताल के निर्माण के लिए किसी मुस्लिम बहुल क्षेत्र का चयन किया जाएगा। इसके बाद हिंदुओं के दान से एकत्रित धन से उस अस्पताल में मुसलमानों का इलाज किया जाएगा।
और उस समय यह तर्क दिया जाएगा कि मुसलमानों ने भी राम मंदिर के निर्माण के लिए दान दिया था, इसलिए इस धन पर उनका भी अधिकार है।
मेरे अनुसार, इस प्रकार की पूरी प्रक्रिया को इस्लाम से जुड़े प्रभावशाली तत्व बाहर रहकर भी राजनीति और गोविंद गिरि जैसे व्यक्तियों के माध्यम से संचालित करवा सकते हैं।
यही बात वैष्णो देवी मंदिर के मामले में भी हुई।
वहाँ एक मेडिकल कॉलेज खोला गया और मेरी जानकारी के अनुसार, उसकी लगभग 80% सीटें कश्मीर के मुसलमानों को दे दी गईं।
लेकिन जब लोगों ने इसका विरोध किया और यह मामला सार्वजनिक रूप से उजागर हुआ, तब इसे रोक दिया गया।
अब प्रश्न यह है कि आखिर यह सब हुआ कैसे?
मेरे विचार से वैष्णो देवी मंदिर का संचालन करने वाले और मंदिर के धन के उपयोग का निर्णय लेने वाले व्यक्तियों में से कोई न कोई इस्लाम से जुड़े प्रभावशाली तत्वों के दबाव या प्रभाव में रहा होगा। मुझे इस बात का 100% संदेह है।
मेरे अनुसार, यही स्थिति भारत के लगभग हर गाँव, हर संगठन और हर मंदिर में दिखाई देती है।
मेरा आकलन है कि लगभग 90% स्थानों पर इसी प्रकार की कार्यप्रणाली अपनाई जा रही है।
भारत में मेहनत करने वाला व्यक्ति, भ्रष्ट व्यवस्था और समाजसेवा के नाम पर खड़े संगठन — आखिर जवाबदेही किसकी है?
मेहनत कोई करता है, टैक्स कोई वसूलता है और समाजसेवा का ज्ञान कोई तीसरा देता है!
भारत में जिन लोगों के पास वास्तविक कौशल है, जो लगातार मेहनत कर रहे हैं, नई तकनीक सीख रहे हैं, अपने कौशल को विकसित कर रहे हैं, नए विचारों पर काम कर रहे हैं, नवाचार कर रहे हैं, व्यवसाय खड़े कर रहे हैं और निवेश करके रोजगार तथा आर्थिक अवसर पैदा कर रहे हैं, वे अपने स्तर पर देश को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
लेकिन विडंबना यह है कि इन्हीं लोगों में से अनेक लोग देश की व्यवस्था, भ्रष्टाचार, राजनीति, सामाजिक मानसिकता और काम करने के वातावरण से इतने परेशान हो जाते हैं कि अंततः भारत छोड़कर दूसरे देशों में चले जाते हैं।
जो व्यक्ति अपनी मेहनत, योग्यता और बुद्धिमत्ता से आगे बढ़ना चाहता है, उसके सामने व्यवस्था अनेक प्रकार की बाधाएँ खड़ी कर देती है।
ऐसा प्रतीत होता है कि व्यवस्था योग्य और मेहनती व्यक्ति को आगे बढ़ाने के बजाय उसे नियमों, प्रक्रियाओं, टैक्स और प्रशासनिक जटिलताओं में उलझाए रखने का काम अधिक करती है।
और यदि कोई व्यक्ति इन तमाम बाधाओं के बावजूद सफल हो जाता है, तो उसकी कमाई पर अलग-अलग प्रकार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों तथा अन्य आर्थिक बोझ का दबाव पड़ता है।
कई परिस्थितियों में कुल आर्थिक बोझ 40–42 प्रतिशत या उससे भी अधिक महसूस हो सकता है। हालाँकि वास्तविक कर की दर व्यक्ति की आय, खर्च और परिस्थितियों पर निर्भर करती है, लेकिन यहाँ मूल प्रश्न केवल प्रतिशत का नहीं, बल्कि उस पैसे के उपयोग और जवाबदेही का है।
आखिर एक व्यक्ति अपनी मेहनत से जो कमाता है, उसमें से सरकार को दिया गया इतना बड़ा हिस्सा कहाँ जाता है?
1. मेहनत करने वाले से पैसा लिया जाता है, लेकिन उसके उपयोग की जवाबदेही कौन लेता है?
सरकार जनता से टैक्स वसूलती है। इस पैसे का उद्देश्य देश का विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी सुविधाएँ, सुरक्षा, रोजगार के अवसर और समाज के कमजोर वर्गों की सहायता करना होना चाहिए।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पैसा वास्तव में सही जगह पहुँच रहा है?
क्या जिन योजनाओं के नाम पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं, उनका लाभ वास्तविक जरूरतमंद लोगों तक पहुँचता है?
क्या इन योजनाओं में भ्रष्टाचार नहीं होता?
क्या राजनीतिक लाभ के लिए सरकारी धन का दुरुपयोग नहीं किया जाता?
क्या योजनाओं के संचालन और धन के वितरण में बिचौलियों, भ्रष्ट अधिकारियों और राजनीतिक प्रभाव वाले लोगों की भूमिका की निष्पक्ष जाँच होती है?
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—
जब जनता के पैसे का दुरुपयोग होता है, तो उसे रोकने की जिम्मेदारी कौन लेता है?
मेहनत करने वाले व्यक्ति से टैक्स वसूलना सरकार का अधिकार है, लेकिन उस पैसे का सही उपयोग सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी भी है।
यदि व्यवस्था में भ्रष्टाचार है, तो केवल और अधिक पैसा इकट्ठा करना समाधान नहीं हो सकता।
पहले से उपलब्ध धन का सही उपयोग करना और उसके दुरुपयोग को रोकना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
2. अब समाजसेवा के नाम पर उसी मेहनती व्यक्ति से दोबारा पैसा माँगा जाता है
इस पूरी व्यवस्था में एक और वर्ग सामने आता है।
NGO, सामाजिक संगठन, धार्मिक संस्थाएँ, विभिन्न प्रकार के ट्रस्ट, स्वयंभू समाजसेवी और धर्म के ठेकेदार बनकर बैठे लोग।
इनमें से अनेक लोग समाज में अलग-अलग समस्याओं को लेकर काम करने का दावा करते हैं।
वे लोगों को समझाते हैं कि समाज के लिए क्या करना चाहिए, कहाँ दान देना चाहिए, किन लोगों की सहायता करनी चाहिए और किस प्रकार अपने धर्म तथा समाज के प्रति जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
लेकिन यहाँ एक बुनियादी सवाल पैदा होता है।
जिस व्यक्ति ने अपनी मेहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्सा पहले ही सरकार को दे दिया, उस पैसे का क्या हुआ?
उस पैसे का उपयोग कहाँ होना चाहिए था?
क्या उसका सही उपयोग हो रहा है?
यदि नहीं हो रहा, तो क्यों नहीं हो रहा?
कौन उसे सही जगह पहुँचने से रोक रहा है?
कौन भ्रष्टाचार कर रहा है?
कौन सरकारी योजनाओं का पैसा खा रहा है?
और इन सबको रोकने के लिए ये संगठन वास्तव में क्या कर रहे हैं?
क्या इन संगठनों का पहला काम सरकार और प्रशासन से जवाबदेही माँगना नहीं होना चाहिए?
क्या इन्हें यह सुनिश्चित करने का प्रयास नहीं करना चाहिए कि जनता के टैक्स से इकट्ठा किया गया पैसा सही जगह खर्च हो?
लेकिन अक्सर देखने को मिलता है कि इन बुनियादी सवालों पर गंभीरता से काम करने के बजाय समाजसेवा का एक अलग ही मॉडल खड़ा कर दिया जाता है।
3. पहले दिए गए 40% को भूल जाओ, अब जो बचा है उसमें से हमें दान दो!
यह इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
मान लीजिए, एक व्यक्ति अपनी मेहनत से ₹100 कमाता है।
उदाहरण के लिए, यदि वह अलग-अलग करों और आर्थिक बोझ के रूप में ₹40 दे चुका है, तो उसके पास ₹60 बचते हैं।
अब एक सामाजिक या धार्मिक संगठन उसके पास आता है और कहता है कि समाज में बहुत समस्याएँ हैं।
गरीबों की सहायता करनी है।
बच्चों को पढ़ाना है।
धर्म की रक्षा करनी है।
गाँवों का विकास करना है।
बीमार लोगों की सहायता करनी है।
मंदिर बनाने हैं।
गौशालाएँ चलानी हैं।
समाज को जागरूक करना है।
लेकिन जब उस व्यक्ति का सवाल होता है कि—
"मैंने जो ₹40 पहले ही सरकार को दिए हैं, उनका क्या हुआ? उनका सही उपयोग क्यों नहीं हो रहा? आप लोग उस पैसे के सही उपयोग के लिए क्या कर रहे हैं?"
तो उसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा जवाब मिलता है—
"वह पैसा तो सरकार और राजनीति की व्यवस्था में चला गया। वहाँ भ्रष्टाचार है। हम उसका कुछ नहीं कर सकते। उसे भूल जाओ। अब तुम्हारे पास जो ₹60 बचे हैं, उनमें से हमें कुछ पैसा दो। हम उसका सही उपयोग करेंगे।"
यहीं से असली सवाल शुरू होता है।
यदि आप पहले से दिए गए ₹40 के सही उपयोग के लिए संघर्ष नहीं कर सकते, तो बचे हुए ₹60 में से दोबारा पैसा माँगने का नैतिक आधार क्या है?
यदि कोई संगठन समाज की समस्याओं को दूर करने का दावा करता है, तो क्या उसे केवल दान इकट्ठा करने तक सीमित रहना चाहिए?
या उसे उन कारणों को भी दूर करने का प्रयास करना चाहिए, जिनकी वजह से समाज में बार-बार वही समस्याएँ पैदा होती हैं?
4. समस्या का समाधान करना और समस्या के नाम पर संगठन चलाना — दोनों अलग बातें हैं
किसी भूखे व्यक्ति को भोजन देना अच्छा काम है।
किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाना भी अच्छा काम है।
किसी बीमार व्यक्ति का इलाज करवाना, किसी असहाय बुजुर्ग को आश्रय देना या किसी जरूरतमंद परिवार की सहायता करना भी महत्वपूर्ण सामाजिक कार्य है।
लेकिन क्या समाजसेवा का उद्देश्य केवल इन समस्याओं को अस्थायी रूप से कम करना होना चाहिए?
या उन समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए भी काम करना चाहिए?
उदाहरण के लिए, यदि किसी गाँव में सरकारी विद्यालय मौजूद है, उसके लिए सरकारी बजट भी निर्धारित है, लेकिन भ्रष्टाचार, लापरवाही या प्रशासनिक विफलता के कारण वहाँ शिक्षा की व्यवस्था खराब है, तो क्या सबसे पहला प्रयास उस सरकारी विद्यालय को ठीक करवाना नहीं होना चाहिए?
या फिर एक नया संगठन बनाकर लोगों से दोबारा पैसा इकट्ठा करना और अलग विद्यालय चलाना ही समाधान है?
इसी प्रकार, यदि सरकारी अस्पतालों के लिए बजट उपलब्ध है, लेकिन सुविधाएँ जरूरतमंदों तक नहीं पहुँच रहीं, तो क्या समाजसेवी संगठनों को पहले उस व्यवस्था को सुधारने का प्रयास नहीं करना चाहिए?
समस्या को कुछ समय के लिए कम करना और समस्या के मूल कारण को समाप्त करना, दो अलग-अलग कार्य हैं।
दोनों की अपनी उपयोगिता हो सकती है, लेकिन केवल अस्थायी सहायता को स्थायी समाधान बताना उचित नहीं है।
इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या कुछ संगठनों का अस्तित्व ही इन समस्याओं के लगातार बने रहने पर निर्भर हो गया है?
यदि समस्याएँ समाप्त हो जाएँ, तो क्या उनके दान, प्रभाव, पहचान और राजनीतिक महत्व पर असर पड़ेगा?
यह सवाल सभी संगठनों पर आरोप नहीं है, बल्कि उनकी कार्यप्रणाली और जवाबदेही की जाँच का विषय है।
5. समाजसेवा, धार्मिक कार्य और राजनीतिक प्रभाव का बढ़ता संबंध
आज समाजसेवा और धार्मिक गतिविधियों के नाम पर अनेक प्रकार के संगठन सक्रिय हैं।
कुछ वास्तव में निस्वार्थ भाव से काम करते हैं।
कुछ लोग अपना समय, मेहनत और पैसा लगाकर बिना किसी प्रचार के समाज के लिए महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
लेकिन ऐसे संगठनों और व्यक्तियों की भी कमी नहीं है, जिनकी कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा सकते हैं।
कहीं समाजसेवा के माध्यम से व्यक्तिगत पहचान बनाई जाती है।
कहीं धार्मिक गतिविधियों के माध्यम से सामाजिक प्रभाव बढ़ाया जाता है।
कहीं बड़े कार्यक्रमों के जरिए राजनीतिक संपर्क मजबूत किए जाते हैं।
कहीं दान और चंदे के माध्यम से आर्थिक संसाधन जुटाए जाते हैं।
और कहीं वास्तविक सामाजिक समस्याओं के समाधान की अपेक्षा प्रचार, भाषण, सोशल मीडिया और संगठन के विस्तार को अधिक महत्व दिया जाता है।
यहाँ सवाल यह नहीं है कि मंदिर बनाना गलत है, गौशाला चलाना गलत है, गरीबों की सहायता करना गलत है या धार्मिक जागरण करना गलत है।
सवाल यह है कि इन गतिविधियों पर खर्च होने वाले पैसे, समय और संसाधनों से समाज को वास्तव में कितना लाभ मिल रहा है?
क्या इन कार्यों का कोई स्पष्ट लक्ष्य है?
क्या इनके परिणामों का मूल्यांकन होता है?
क्या दान देने वाले लोगों को बताया जाता है कि उनके पैसे का कितना हिस्सा वास्तविक कार्यों पर खर्च हुआ और कितना हिस्सा प्रशासन, प्रचार, कार्यक्रमों तथा संगठन चलाने में लगा?
क्या इन संगठनों के काम से समाज की समस्याएँ स्थायी रूप से कम हो रही हैं?
या केवल संगठन का आकार, प्रभाव और पहचान बढ़ रही है?
6. समाजसेवा के नाम पर अलग-अलग श्रेणियाँ और संगठन
आज समाजसेवा, धर्म, जनजागरण और सामाजिक सहायता के नाम पर काम करने वाले लोगों तथा संगठनों ने अपनी-अपनी अलग श्रेणियाँ बना रखी हैं।
इनमें से प्रत्येक श्रेणी के कार्य करने का तरीका, उद्देश्य, आर्थिक मॉडल, सामाजिक प्रभाव और वास्तविक परिणाम अलग-अलग हैं।
इन गतिविधियों में कई अच्छे और आवश्यक कार्य भी हो रहे हैं, लेकिन इनके साथ कुछ बुनियादी सवाल जुड़े हुए हैं।
क्या उपलब्ध संसाधनों का सही उपयोग हो रहा है?
क्या ये संगठन एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करते हैं?
क्या इनकी गतिविधियों में अनावश्यक दोहराव है?
क्या ये समस्याओं के स्थायी समाधान की दिशा में काम कर रहे हैं?
क्या इनके कार्यों का वास्तविक लाभ जरूरतमंद लोगों तक पहुँचता है?
और क्या कुछ संगठन सामाजिक कार्यों को व्यक्तिगत, आर्थिक या राजनीतिक लाभ प्राप्त करने का माध्यम बना रहे हैं?
इन सवालों को समझने के लिए सबसे पहले इनकी अलग-अलग श्रेणियों को देखना आवश्यक है।
समाजसेवा और धार्मिक संगठनों की प्रमुख श्रेणियाँ
1. मंदिर निर्माण करने वाले संगठन
मंदिरों के निर्माण, विस्तार, सौंदर्यीकरण और धार्मिक परिसरों के विकास के लिए धन जुटाने वाले संगठन।
2. गौशाला चलाने वाले संगठन
गायों के संरक्षण, पालन-पोषण, चिकित्सा और गौशालाओं के संचालन के लिए काम करने वाली संस्थाएँ।
3. केवल सोशल मीडिया और इन्फ्लुएंसर के रूप में सक्रिय लोग
यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर धर्म, समाज, राजनीति तथा सामाजिक समस्याओं से संबंधित सामग्री बनाकर लोगों को प्रभावित करने वाले व्यक्ति और समूह।
4. पशु सेवा और संरक्षण करने वाले संगठन
आवारा, घायल, बीमार और असहाय पशुओं की सहायता, उपचार तथा संरक्षण के लिए काम करने वाली संस्थाएँ।
5. पाकिस्तान में हिंदुओं की सहायता करने वाले संगठन
पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू समुदाय के लोगों की सुरक्षा, अधिकारों, पुनर्वास और अन्य समस्याओं को लेकर काम करने वाले संगठन।
6. पश्चिम बंगाल के हिंदुओं की सहायता करने वाले संगठन
पश्चिम बंगाल में हिंदू समुदाय से जुड़ी सामाजिक, आर्थिक, सुरक्षा और अन्य समस्याओं पर काम करने वाले समूह।
7. कश्मीर के हिंदुओं की सहायता करने वाले संगठन
कश्मीरी हिंदुओं के अधिकारों, पुनर्वास, सुरक्षा, सांस्कृतिक संरक्षण और अन्य समस्याओं को लेकर काम करने वाली संस्थाएँ।
8. केरल के हिंदुओं की सहायता करने वाले संगठन
केरल में हिंदू समुदाय से संबंधित सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और अन्य मुद्दों पर सक्रिय संगठन।
9. मणिपुर के हिंदुओं की सहायता करने वाले संगठन
मणिपुर में हिंदू समुदाय से संबंधित राहत, सुरक्षा, पुनर्वास और सामाजिक सहायता के लिए काम करने वाले समूह।
10. दिव्यांग और गंभीर बीमारियों से पीड़ित हिंदुओं की सहायता करने वाले संगठन
दिव्यांग व्यक्तियों, गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों तथा आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के इलाज और सहायता के लिए काम करने वाली संस्थाएँ।
11. गरीब, आदिवासी और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले हिंदुओं की सहायता करने वाले संगठन
गाँवों, जंगलों, आदिवासी क्षेत्रों और देश के दूरस्थ इलाकों में रहने वाले गरीब तथा वंचित हिंदू परिवारों की शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक सहायता और सामाजिक विकास के लिए काम करने वाले संगठन।
12. वृद्धाश्रम चलाने वाले संगठन
बेसहारा, जरूरतमंद और परिवार से अलग रह रहे बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रम, भोजन, चिकित्सा और रहने की व्यवस्था करने वाली संस्थाएँ।
13. बड़े भंडारे और लंगर आयोजित करने वाले संगठन
बड़े स्तर पर मुफ्त भोजन वितरण, धार्मिक भंडारे, लंगर और सामूहिक भोजन कार्यक्रम आयोजित करने वाले संगठन।
14. हिंदू जागरण, धार्मिक प्रचार और राजनीतिक प्रभाव से जुड़े संगठन
गाँव-गाँव जाकर बड़े धार्मिक कार्यक्रम, सभाएँ, भाषण, जनजागरण अभियान और सामाजिक आयोजन करने वाले समूह, जिनकी गतिविधियों में कभी-कभी राजनीतिक विचारधारा तथा राजनीतिक प्रभाव भी शामिल होता है।
15. व्यक्तिगत स्तर पर पर्यावरण और जलस्रोतों की सफाई करने वाले लोग
ऐसे व्यक्ति और छोटे समूह, जो बिना किसी बड़े संगठन के अपने समय, मेहनत और व्यक्तिगत धन का उपयोग करके नालों, तालाबों, नदियों तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों की सफाई करते हैं।
अंतिम सवाल — समाजसेवा का उद्देश्य समस्याओं का समाधान है या उनके नाम पर अपनी व्यवस्था खड़ी करना?
इन सभी श्रेणियों के अपने-अपने उद्देश्य हैं।
इनमें कई लोग वास्तव में अच्छा काम कर रहे हैं और उनका योगदान महत्वपूर्ण है।
लेकिन केवल अच्छा उद्देश्य बताना पर्याप्त नहीं है।
किसी संगठन की वास्तविक उपयोगिता का मूल्यांकन उसके दावों, भाषणों, धार्मिक पहचान, सोशल मीडिया पर लोकप्रियता या कार्यक्रमों में जुटने वाली भीड़ से नहीं, बल्कि उसके कार्यों के वास्तविक परिणामों से होना चाहिए।
हमें यह समझना होगा कि समाजसेवा के नाम पर खर्च होने वाला पैसा वास्तव में कितनी समस्याओं का समाधान कर रहा है।
कितना पैसा वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुँचता है?
कितना पैसा संगठन चलाने में खर्च होता है?
कितना पैसा प्रचार और व्यक्तिगत छवि बनाने में लगाया जाता है?
कितने संगठन सरकारी व्यवस्था में मौजूद भ्रष्टाचार और अक्षमता के खिलाफ वास्तविक काम करते हैं?
कितने संगठन जनता के टैक्स के पैसे का सही उपयोग सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष करते हैं?
और कितने संगठन केवल उसी जनता से बार-बार नया दान माँगते रहते हैं?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि जनता के टैक्स का पैसा सही तरीके से इस्तेमाल हो, सरकारी संस्थाएँ अपना काम ईमानदारी से करें और भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण हो, तो क्या समाज की अनेक समस्याओं के लिए बार-बार अलग से चंदा और दान इकट्ठा करने की आवश्यकता उतनी ही रहेगी?
यह सवाल केवल सरकार से नहीं है।
यह सवाल उन सभी NGO, धार्मिक संगठनों, सामाजिक संस्थाओं, प्रभावशाली व्यक्तियों और स्वयंभू समाजसेवियों से भी है, जो समाज को सुधारने की जिम्मेदारी लेने का दावा करते हैं।
क्योंकि जो व्यक्ति मेहनत कर रहा है, कौशल विकसित कर रहा है, नवाचार कर रहा है, निवेश कर रहा है, रोजगार पैदा कर रहा है और टैक्स दे रहा है, वह पहले ही समाज और देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।
उसे बार-बार यह समझाने से पहले कि समाज के लिए उसे और कितना पैसा देना चाहिए, यह बताना भी जरूरी है कि उसने जो पैसा पहले ही दिया है, उसका सही उपयोग सुनिश्चित करने के लिए क्या किया जा रहा है।
समाजसेवा का उद्देश्य केवल अच्छे लोगों से और पैसा लेना नहीं, बल्कि पहले से उपलब्ध सार्वजनिक संसाधनों का सही उपयोग सुनिश्चित करना और समस्याओं के स्थायी समाधान की दिशा में काम करना भी होना चाहिए।
और इसी आधार पर अब इन सभी 15 श्रेणियों की कार्यप्रणाली, कमियों, संसाधनों के उपयोग, संभावित स्वार्थ, राजनीतिक लाभ और वास्तविक सामाजिक परिणामों का अलग-अलग विश्लेषण करना आवश्यक है।
क्योंकि सवाल दान देने या न देने का नहीं है। सवाल यह है कि समाज के नाम पर इकट्ठा होने वाले पैसे और संसाधनों से समाज वास्तव में कितना आगे बढ़ रहा है।
समाजसेवा या समाज पर अतिरिक्त बोझ?
टैक्स, भ्रष्टाचार, महँगे इलाज और व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर कुछ असहज सवाल
7. यदि समाज के सारे काम मुझे अपने समय और पैसे से ही करने हैं, तो आखिर टैक्स किस बात का लिया जा रहा है?
मेरा सबसे पहला और बुनियादी सवाल यही है।
यदि मुझे अपनी मेहनत से पैसा कमाना है, टैक्स भी देना है और उसके बाद समाज की लगभग हर समस्या का समाधान भी अपने व्यक्तिगत पैसे और समय से करना है, तो आखिर सरकार को टैक्स देने का उद्देश्य क्या है?
गरीबों की सहायता मुझे करनी है।
बीमार लोगों के इलाज के लिए पैसा मुझे देना है।
बच्चों की शिक्षा के लिए दान मुझे देना है।
गाँवों के विकास के लिए मुझे योगदान देना है।
गौशालाएँ मुझे चलानी हैं।
नदियों, तालाबों और नालों की सफाई मुझे करनी है।
बुजुर्गों की देखभाल के लिए मुझे पैसा देना है।
और समाज की दूसरी समस्याओं के लिए भी मुझे ही बार-बार चंदा देना है।
तो फिर सरकार किस काम के लिए है?
यदि सार्वजनिक समस्याओं के समाधान की जिम्मेदारी बार-बार व्यक्तिगत दान पर डाल दी जाती है, तो टैक्स के रूप में पहले से इकट्ठा किए गए धन की जवाबदेही कौन लेगा?
मेरे लिए यह केवल टैक्स की दर का सवाल नहीं है। यह पूरी व्यवस्था की कार्यक्षमता और ईमानदारी का सवाल है।
जब भ्रष्टाचार के कारण सरकारी धन का दुरुपयोग होता है और उसके बावजूद जनता से लगातार टैक्स वसूला जाता है, तो ऐसी व्यवस्था भ्रष्टाचार को आर्थिक रूप से बनाए रखने वाला तंत्र बन सकती है।
इसलिए सवाल उठता है कि कहीं टैक्स वसूलने और उसके खर्च में जवाबदेही की कमी भ्रष्टाचार के लिए एक प्रकार का समर्थन तंत्र तो नहीं बन गई है?
मैं टैक्स के अस्तित्व से अधिक उस व्यवस्था पर सवाल उठा रहा हूँ, जिसमें मेहनत करने वाले व्यक्ति से पैसा लेना अनिवार्य है, लेकिन उस पैसे का सही उपयोग सुनिश्चित करना उतनी ही कठोरता से लागू नहीं होता।
8. क्या हर सामाजिक कार्य वास्तव में समाज के लिए उपयोगी है?
समाजसेवा के नाम पर होने वाला हर कार्य अपने आप में उपयोगी, प्रभावशाली या आवश्यक नहीं हो जाता।
कुछ कार्य वास्तव में लोगों की जिंदगी बदलते हैं।
लेकिन कुछ गतिविधियाँ ऐसी भी हो सकती हैं, जिनका कोई स्पष्ट और मापने योग्य परिणाम सामने नहीं आता।
फिर भी उनके नाम पर बड़े संगठन बनाए जाते हैं, चंदा इकट्ठा किया जाता है, बड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं और सामाजिक प्रतिष्ठा हासिल की जाती है।
कहीं संगठन का विस्तार ही सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाता है।
कहीं राजनीतिक संपर्क बढ़ाना मुख्य उद्देश्य दिखाई देता है।
कहीं बड़े लोगों के साथ मंच साझा करना और तस्वीरें खिंचवाना सफलता का पैमाना बन जाता है।
कहीं सोशल मीडिया पर प्रचार को वास्तविक काम से अधिक महत्व दिया जाता है।
और कहीं दान देने वाले व्यक्ति को यह भी नहीं बताया जाता कि उसके पैसे से आखिर कौन-सी समस्या कितनी कम हुई।
यदि किसी कार्य में लगातार पैसा, समय और संसाधन खर्च हो रहे हैं, लेकिन उसका कोई स्पष्ट सामाजिक परिणाम नहीं है, तो उस कार्य की उपयोगिता पर सवाल उठाना आवश्यक है।
ऐसी गतिविधियाँ समाज के लिए उपयोगी होने के बजाय सीमित संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ बन सकती हैं।
समाजसेवा का मूल्यांकन केवल भावना, लोकप्रियता, धार्मिक पहचान या प्रचार के आधार पर नहीं होना चाहिए।
उसके वास्तविक परिणाम, खर्च, पारदर्शिता और दीर्घकालिक प्रभाव भी देखे जाने चाहिए।
9. एक बच्चे के इलाज के लिए ₹10 करोड़ — समाज को किन सवालों पर विचार करना चाहिए?
आजकल कई ऐसे मामले सामने आते हैं, जिनमें एक या दो वर्ष के बच्चे को कोई दुर्लभ और गंभीर बीमारी होती है।
उसके इलाज के लिए कई करोड़ रुपये की आवश्यकता बताई जाती है।
कभी ₹5 करोड़, कभी ₹10 करोड़ और कभी उससे भी अधिक।
इसके बाद सोशल मीडिया पर अभियान शुरू होता है।
NGO सक्रिय हो जाते हैं।
धार्मिक और सामाजिक संगठन सहायता की अपील करने लगते हैं।
लोगों से भावनात्मक आधार पर दान माँगा जाता है।
ऐसी स्थिति में माता-पिता की भावना समझना कठिन नहीं है। हर माता-पिता अपने बच्चे को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहते हैं।
लेकिन जब इलाज के लिए समाज से ₹10 करोड़ जैसी बड़ी राशि माँगी जाती है, तो कुछ महत्वपूर्ण सवाल भी उठते हैं।
क्या केवल भावनात्मक अपील के आधार पर इतनी बड़ी राशि खर्च करने का निर्णय उचित है, या इसके लिए चिकित्सा संबंधी प्रमाण, पारदर्शिता और स्वतंत्र मूल्यांकन भी आवश्यक होना चाहिए?
क्या उस इलाज की सफलता के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हैं?
क्या इलाज के बाद बच्चे के स्वस्थ होने की वास्तविक संभावना स्पष्ट की गई है?
क्या इलाज से बीमारी ठीक होगी या केवल कुछ समय के लिए उसकी स्थिति में सुधार होगा?
क्या इसके सस्ते और प्रभावी विकल्प उपलब्ध हैं?
क्या दवा या उपचार की इतनी अधिक कीमत वास्तव में उचित है?
क्या सरकार, दवा निर्माता कंपनी, बीमा व्यवस्था या अन्य संस्थाओं से आर्थिक सहायता प्राप्त करने की कोशिश की गई है?
और यदि समाज से इतनी बड़ी राशि इकट्ठा की जाती है, तो क्या उसके उपयोग की स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए?
ये सवाल पूछना संवेदनहीनता नहीं है। सीमित संसाधनों का जिम्मेदारी से उपयोग करने के लिए ये आवश्यक सवाल हैं।
आर्थिक योगदान और मानव जीवन का मूल्य
एक और कठिन सवाल यह है कि जब किसी एक इलाज पर ₹10 करोड़ खर्च करने की बात होती है, तो समाज के सीमित संसाधनों का उपयोग किस प्रकार तय किया जाए?
उसी राशि से कितने दूसरे मरीजों का इलाज संभव है?
कितने बच्चों का टीकाकरण, पोषण या प्राथमिक उपचार हो सकता है?
कितनी गंभीर बीमारियों का समय रहते पता लगाया जा सकता है?
कितने परिवारों को स्वास्थ्य बीमा या आवश्यक चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा सकती हैं?
यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।
किसी बच्चे या उसके परिवार ने पिछले 100 वर्षों में समाज को कितना आर्थिक योगदान दिया है, यह उसके जीवन के मूल्य का उचित पैमाना नहीं हो सकता।
एक वर्ष के बच्चे से भविष्य में ₹10 करोड़ का आर्थिक परिणाम देने की अपेक्षा भी उचित नहीं है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि इलाज की लागत, वैज्ञानिक प्रभावशीलता और उपलब्ध संसाधनों के वैकल्पिक उपयोग पर सवाल नहीं पूछे जा सकते।
किसी व्यक्ति के जीवन का सम्मान करना और किसी अत्यधिक महँगे इलाज पर सार्वजनिक या दान की राशि खर्च करने से पहले उसका मूल्यांकन करना, दोनों एक साथ संभव हैं।
समाज को भावनाओं के साथ-साथ प्रमाण, पारदर्शिता और संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग पर भी ध्यान देना चाहिए।
10. करोड़ों रुपये की सहायता मिलने के बाद समाज के प्रति जिम्मेदारी कहाँ है?
जब किसी परिवार को समाज के हजारों लोगों से आर्थिक सहायता मिलती है, तो यह एक बड़ी सामूहिक उपलब्धि होती है।
लेकिन यहाँ एक और सवाल उठता है।
क्या सहायता प्राप्त करने वाले परिवारों में समाज के प्रति कोई दीर्घकालिक जिम्मेदारी विकसित होती है?
क्या वे भविष्य में अपनी क्षमता के अनुसार दूसरे जरूरतमंद लोगों की सहायता करते हैं?
क्या वे उस बीमारी के बारे में जागरूकता फैलाते हैं?
क्या वे अन्य प्रभावित परिवारों को इलाज, सरकारी योजनाओं या आर्थिक सहायता प्राप्त करने में मार्गदर्शन देते हैं?
क्या वे अपने अनुभव का उपयोग करके समाज को कुछ वापस देने का प्रयास करते हैं?
अक्सर सार्वजनिक रूप से यह सुनने को मिलता है कि भगवान की कृपा से सहायता मिली या बच्चा बच गया।
धार्मिक आस्था रखना किसी का व्यक्तिगत अधिकार है।
लेकिन जिस सहायता में हजारों लोगों का पैसा, मेहनत और समय लगा हो, उसमें उन लोगों के योगदान को भी उचित सम्मान मिलना चाहिए।
समाज से मिली सहायता को केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि मानकर भूल जाना उचित सामाजिक दृष्टिकोण नहीं है।
हालाँकि सहायता प्राप्त करने वाला प्रत्येक व्यक्ति भविष्य में समाजसेवा नहीं करता, ऐसा कोई सार्वभौमिक निष्कर्ष निकालना भी सही नहीं होगा।
मेरा सवाल यह है कि क्या सामाजिक सहायता की व्यवस्था में कृतज्ञता, पारदर्शिता, जागरूकता और भविष्य में स्वैच्छिक योगदान देने की संस्कृति को अधिक महत्व नहीं दिया जाना चाहिए?
समाज की सहायता कोई कर्ज नहीं है जिसे हर हाल में चुकाना पड़े। लेकिन जो व्यक्ति भविष्य में सक्षम हो जाता है, उससे यह अपेक्षा करना अनुचित नहीं कि वह दूसरे जरूरतमंद लोगों के लिए भी कुछ करने का प्रयास करे।
11. बीमारियों के इलाज के लिए दान — व्यक्तिगत जिम्मेदारी का सवाल क्यों नहीं उठता?
अब दूसरी श्रेणी को देखते हैं।
ऐसे लोग जो विभिन्न बीमारियों से पीड़ित हैं और अपने इलाज के लिए समाज से आर्थिक सहायता माँगते हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि अनेक बीमारियाँ व्यक्ति के नियंत्रण से बाहर होती हैं।
लेकिन कुछ बीमारियों और स्वास्थ्य समस्याओं में व्यक्ति की जीवनशैली, शराब का अत्यधिक सेवन, तंबाकू, नशा, खानपान, शारीरिक निष्क्रियता और स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही जैसी चीजें भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
ऐसे मामलों में व्यक्तिगत जिम्मेदारी का सवाल क्यों नहीं उठाया जाता?
यदि कोई व्यक्ति वर्षों तक अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा करता है, अनावश्यक खर्च करता है, अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार योजना नहीं बनाता और फिर किसी गंभीर बीमारी के समय पूरी तरह समाज से सहायता की अपेक्षा करता है, तो क्या इस स्थिति पर चर्चा नहीं होनी चाहिए?
क्या समाजसेवा का अर्थ केवल इलाज के समय पैसा देना है?
या लोगों को पहले से स्वास्थ्य, बचत, बीमा और वित्तीय अनुशासन के प्रति जागरूक करना भी है?
स्वास्थ्य बीमा और आर्थिक योजना की जिम्मेदारी
कई लोग अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा मनोरंजन, दिखावे, अनावश्यक खर्च और अव्यवस्थित जीवनशैली में खर्च कर देते हैं।
लेकिन भविष्य के लिए पर्याप्त बचत नहीं करते।
स्वास्थ्य बीमा नहीं लेते।
आपातकालीन निधि नहीं बनाते।
परिवार की आर्थिक सुरक्षा के लिए टर्म इंश्योरेंस जैसी व्यवस्थाओं पर विचार नहीं करते।
और जब कोई बड़ी समस्या आती है, तो समाज से आर्थिक सहायता की अपेक्षा करते हैं।
यहाँ सवाल उठता है—
क्या व्यक्ति को अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार भविष्य की समस्याओं के लिए तैयारी करने की जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए?
हालाँकि यह भी समझना आवश्यक है कि हर व्यक्ति बीमा खरीदने में सक्षम नहीं होता, हर बीमारी बीमा में कवर नहीं होती और कई गंभीर बीमारियाँ स्वस्थ जीवनशैली अपनाने वाले लोगों को भी हो सकती हैं।
इसलिए बिना प्रमाण यह कहना कि अधिकांश बीमार लोग अपनी गलतियों के कारण बीमार हुए हैं, उचित नहीं होगा।
लेकिन जहाँ स्पष्ट रूप से लापरवाही, आर्थिक अव्यवस्था या जोखिमपूर्ण जीवनशैली का योगदान है, वहाँ रोकथाम और व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर चर्चा अवश्य होनी चाहिए।
12. समाजसेवा का उद्देश्य केवल खर्च उठाना है या लोगों को जिम्मेदार बनाना भी?
यदि कोई संगठन हर वर्ष हजारों लोगों के इलाज के लिए चंदा इकट्ठा करता है, तो क्या उसे यह भी देखना चाहिए कि उनमें से कितनी समस्याओं को समय रहते रोका जा सकता था?
क्या लोगों को स्वास्थ्य बीमा के बारे में जागरूक किया गया?
क्या नशामुक्ति पर काम किया गया?
क्या स्वास्थ्य जाँच और बीमारी की शुरुआती पहचान के लिए अभियान चलाए गए?
क्या गरीब परिवारों को सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ दिलाने का प्रयास किया गया?
क्या इलाज की कीमतों और अस्पतालों के बिलों की पारदर्शिता पर सवाल उठाए गए?
क्या महँगी दवाओं के सस्ते विकल्प खोजने का प्रयास हुआ?
क्या ऐसे प्रयास किए गए, जिनसे भविष्य में कम लोगों को आर्थिक सहायता माँगनी पड़े?
यदि कोई संगठन हर वर्ष उसी प्रकार की समस्याओं के लिए चंदा इकट्ठा कर रहा है, लेकिन उन समस्याओं के कारणों को कम करने के लिए काम नहीं कर रहा, तो उसकी कार्यप्रणाली की समीक्षा होनी चाहिए।
किसी बीमार व्यक्ति को इलाज से वंचित करना समाधान नहीं है।
लेकिन केवल इलाज के लिए पैसा इकट्ठा करते रहना भी पर्याप्त समाधान नहीं है।
एक बेहतर व्यवस्था में तत्काल सहायता के साथ रोकथाम, बीमा, वित्तीय जागरूकता, चिकित्सा संबंधी पारदर्शिता और सरकारी जवाबदेही पर भी काम होना चाहिए।
अंतिम प्रश्न — समाज को भावनात्मक दान चाहिए या परिणाम देने वाली व्यवस्था?
समाज के पास पैसा, समय और संसाधन सीमित हैं।
इन संसाधनों का उपयोग सोच-समझकर होना चाहिए।
किसी भी सामाजिक कार्य को केवल इसलिए सही नहीं मान लेना चाहिए क्योंकि उसके साथ धर्म, मानवता, सेवा या किसी भावनात्मक घटना का नाम जुड़ा हुआ है।
दान माँगने वाले संगठन से सवाल पूछना गलत नहीं है।
उसके खर्च का हिसाब माँगना गलत नहीं है।
उसके कार्यों के परिणाम जानना गलत नहीं है।
और यह पूछना भी गलत नहीं है कि किसी समस्या का स्थायी समाधान खोजने के बजाय हर वर्ष उसी समस्या के नाम पर नया चंदा क्यों इकट्ठा किया जा रहा है।
लेकिन संसाधनों की उपयोगिता का मूल्यांकन करते समय किसी गरीब, बीमार, दिव्यांग या असहाय व्यक्ति के जीवन का मूल्य उसकी कमाई, पारिवारिक संपत्ति या भविष्य के आर्थिक योगदान से तय नहीं किया जाना चाहिए।
असल सवाल व्यक्ति के अस्तित्व का नहीं, बल्कि सहायता देने वाली व्यवस्था की कार्यक्षमता का है।
यदि किसी इलाज पर ₹10 करोड़ खर्च होने हैं, तो उसके वैज्ञानिक प्रमाण, सफलता की संभावना, लागत, विकल्प और आर्थिक पारदर्शिता की जाँच होनी चाहिए।
यदि कोई NGO हर वर्ष करोड़ों रुपये इकट्ठा करता है, तो उसके वास्तविक सामाजिक परिणामों की समीक्षा होनी चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति सक्षम होते हुए भी अपने स्वास्थ्य और आर्थिक भविष्य के प्रति लगातार लापरवाह है, तो व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर भी चर्चा होनी चाहिए।
और यदि सरकार पहले से जनता से टैक्स वसूल रही है, तो उसे यह बताना चाहिए कि उस पैसे से सार्वजनिक समस्याओं का समाधान क्यों नहीं हो पा रहा।
मेहनत करने वाले व्यक्ति को समाज की हर समस्या के लिए बार-बार आर्थिक जिम्मेदारी उठाने वाला अंतिम विकल्प नहीं बना देना चाहिए।
क्योंकि एक बेहतर समाज केवल अधिक दान देने से नहीं बनता।
वह पारदर्शी व्यवस्था, जिम्मेदार नागरिकों, ईमानदार संस्थाओं, प्रभावी सरकारी सेवाओं और उपलब्ध संसाधनों के उचित उपयोग से बनता है।
समाजसेवा की वास्तविक सफलता यह नहीं होनी चाहिए कि हर वर्ष कितना अधिक चंदा इकट्ठा हुआ, बल्कि यह होनी चाहिए कि कितनी समस्याओं का स्थायी समाधान हुआ और कितने लोगों को भविष्य में चंदा माँगने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी।





